महाभारत युद्ध में किसी भी शत्रु से अधिक बलवान था ‘अभिमन्यु’

महाभारत युद्ध में

किसी भी शत्रु से

अधिक बलवान था

‘अभिमन्यु’

 

वीर अभिमन्यु

वीरता, बुद्धिमानी और पौरुष का एक महान उदाहरण है महाभारत युग का ‘वीर अभिमन्यु’, जिसे अर्जुन-पुत्र के नाम से भी जाना जाता है। पाण्डवों में से सबसे कुशल और आकर्षक, इन्द्र देव द्वारा कुंती को वरदान में दिए गए अर्जुन को समस्त संसार उनके धनुर्धारी कौशल के लिए जानता है।

सुभद्रा और अर्जुन की संतान

अर्जुन की तरह ही उनका पुत्र भी उनकी छाया लेकर पैदा हुआ था। बचपन से ही अपने माता-पिता और अन्य पाण्डु भाइयों का आदर करने वाला अभिमन्यु, श्री कृष्ण की बहन सुभद्रा और अर्जुन की संतान था। अभिमन्यु का बचपन कृष्ण की नगरी द्वारिका में ही बीता था, जहां कृष्णजी के संरक्षण में उसने हर तरह का योग्य ज्ञान हासिल किया।

शस्त्रों का ज्ञान

शस्त्रों का ज्ञान उसे आरंभिक चरण में श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न द्वारा दिया गया था। बाद में अर्जुन ने अपने पुत्र को धनुष विद्या में कुशल बनाया। कहते हैं कि ना केवल अपने जीवन के दौरान, बल्कि इस संसार में आने से पहले ही अभिमन्यु ने अपनी माता सुभद्रा के गर्भ में युद्ध का ज्ञान हासिल कर लिया था।

गर्भ में ज्ञान

यह तब की बात है जब अर्जुन अपनी पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदने की तकनीक समझा रहे थे। उस समय अभिमन्यु सुभद्रा के गर्भ में था और उनकी सारी बातों को सुन रहा था। अर्जुन अपनी पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूह में जाने, उसके सारे व्यूह भेदने और अंत में वहां से कैसे बाहर आना है, उसकी कला बता रहे थे।

चक्रव्यूह भेदने की तकनीक

अर्जुन एक के बाद एक सुभद्रा को व्यूह में प्रवेश करने और शत्रुओं को कैसे पराजित किया जाए, उसका वर्णन कर रहे थे। अर्जुन द्वारा सुभद्रा को मकरव्यूह, कर्मव्यूह और सर्पव्यूह की जानकारी दी गई। यह सब पार करने के बाद किस तरह से चक्रव्यूह से बाहर आया जा सकता है, यह अर्जुन बताने ही वाले थे कि उन्होंने देखा कि उनकी पत्नी सो गई है।

अर्जुन के बाद अभिमन्यु

सुभद्रा को सोता हुआ देख अर्जुन ने उन्हें आगे परेशान करना ठीक ना समझा और वहां से चले गए। इस प्रकार से अभिमन्यु ने चक्रव्यूह के बहुत से राज़ जान तो लिए लेकिन अंतिम और बेहद महत्वपूर्ण तरीका वह जान ना सका। पूरे महाभारत काल में अर्जुन के बाद यदि कोई चक्रव्यूह में जाने का साहस कर सकता था तो वह केवल अभिमन्यु था।

चक्रव्यूह में प्रवेश

गुरु द्रोण ने यह कला केवल अर्जुन को ही सिखाई थी। उन्होंने खुद अपने पुत्र को भी चक्रव्यूह भेदने की कला नहीं सिखाई थी। अभिमन्यु अपने पिता की तरह ही चक्रव्यूह में प्रवेश करना जानता था, अपितु वहां से बाहर कैसे आया जाए, यह वह नहीं जानता था, जिसका लाभ शत्रुओं ने उठाया।

अर्जुन-सुभद्रा विवाह

शस्त्र विद्या के अलावा यदि अभिमन्यु के शेष जीवन पर गौर किया जाए तो वह भी काफी रोचक था। अभिमन्यु हमेशा अपनों से बड़ों का आदर करता और श्री कृष्ण की हर आज्ञा का पालन भी करता। एक पौराणिक कथा के अनुसार अभिमन्यु के पिता अर्जुन ने उनकी माता सुभद्रा को द्वारका से भगाकर विवाह किया था।

ज्येष्ठ भ्राता बलराम

सुभद्रा के ज्येष्ठ भ्राता बलराम उसका विवाह कौरवों के ज्येष्ठ दुर्योधन से कराना चाहते थे, लेकिन श्री कृष्ण की योजना तो कुछ और ही थी। उन्होंने अर्जुन को सुभद्रा को चोरी-छिपे ले जाने का इशारा दिया और वह दोनों ऐसा करने में सफल भी हुए। एक पीढ़ी पश्चात् जब बलराम की पुत्री वत्सला पैदा हुई तो उन्होंने इसका विवाह दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण से करने का फैसला किया।

अभिमन्यु-वत्सला विवाह

यह बात जब श्रीकृष्ण को पता लगी तो उन्होंने बरसों पहले अपनाई गई उस योजना को दोहराने का निश्चय किया। उन्होंने अभिमन्यु को घटोत्कच की मदद लेने को कहा। घटोत्कच ने आज्ञा अनुसार वत्सला का हरण किया और अंत में अभिमन्यु और वत्सला का विवाह हुआ।

कुरुक्षेत्र युद्ध

अभिमन्यु का कौशल सभी ने कुरुक्षेत्र युद्ध के 13वें दिन देखा, जब अभिमन्यु एक के बाद एक कौरवों के महारथियों को पराजित कर रहे थे। कौरव सेना भयभीत हो गई। वह समझ नहीं पा रहे थे कि किस प्रकार से अभिमन्यु को रोका जाए।

अभिमन्यु द्वंद्व युद्ध

कहते हैं कि अभिमन्यु द्वंद्व युद्ध में इतने माहिर थे कि कौरवों में शायद ही कोई ऐसा योद्धा था जो उन्हें पराजित कर सके। इसीलिए उन्हें पराजित करने के लिए कौरवों ने छ्ल का सहारा लिया। गुरु द्रोण द्वारा पाण्डवों को हराने के लिए चक्रव्यूह की रचना की गई। वे जानते थे कि चक्रव्यूह को भेदने की कला केवल अर्जुन को आती है, लेकिन अर्जुन-पुत्र की क्षमता से अनजान थे गुरु द्रोण।

चक्रव्यूह भेदने की चुनौती

गुरु द्रोण द्वारा चक्रव्यूह रचा गया परन्तु उस दिन शायद पाण्डवों की किस्मत उनके साथ नहीं थी। गुरु द्रोण ने पाण्डवों को सबके सामने चक्रव्यूह भेदने की चुनौती दी। उस समय किसी कारणवश अर्जुन लड़ते-लड़ते रणक्षेत्र से काफी दूर चले गए थे। वे इस बात से अनजान थे कि गुरु द्रोण द्वारा चक्रव्यूह रचा जा रहा है।

अर्जुन की अनुपस्थिति

अर्जुन की अनुपस्थिति में द्रोणाचार्य ने एक विशाल चक्रव्यूह की रचना की। इस चक्रव्यूह को यदि अर्जुन के बाद कोई भेद सकता था, तो वह था उनका पुत्र अभिमन्यु। तब शेष पाण्डवों ने यह योजना बनाई कि अब वे पीछे नहीं हट सकते, लेकिन अभिमन्यु को सहारा देने के लिए चक्रव्यूह के भीतर जाएंगे।

अर्जुन-पुत्र अभिमन्यु

अर्जुन-पुत्र अभिमन्यु चक्रव्यूह भेदने के लिए उसमें घुस गया। चक्रव्यूह में प्रवेश करने के बाद अभिमन्यु ने कुशलतापूर्वक चक्रव्यूह के छः चरण भेद लिए। इसके दौरान अभिमन्यु द्वारा दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण का वध किया गया। अपने पुत्र को मृत देख दुर्योधन के क्रोध की कोई सीमा ना रही। तब कौरवों ने युद्ध के सारे नियम भुलाकर ऐसा कदम उठाया जो इतिहास में कभी नहीं लिया गया।

आखिरी चरण

छह चरण पार करने के बाद अभिमन्यु जैसे ही सातवें और आखिरी चरण पर पहुंचा, तो उसे दुर्योधन, जयद्रथ आदि सात महारथियों ने घेर लिया। अपने सामने इतने सारे महारथी देख कर भी अभिमन्यु ने साहस ना छोड़ा। उन्होंने अभिमन्यु के रथ को घेर लिया और उसके घोड़ों को मार दिया।

अभिमन्यु का रथ टूट गया

अब अभिमन्यु का रथ टूट चुका था। फिर भी अपनी रक्षा करने के लिए अभिमन्यु ने अपने रथ के पहिये को अपने ऊपर रक्षाकवच बनाते हुए रख लिया, और दाएं हाथ से तलवारबाजी करता रहा। कुछ देर बाद अभिमन्यु की तलवार भी टूट गई और साथ ही कौरवों द्वारा उसके रथ का पहिया भी चकनाचूर कर दिया गया।

अपने बल से लड़ता रहा

इसके बाद भी अभिमन्यु अपने बल से लड़ता रहा और प्रहार करता रहा, किंतु तभी जयद्रथ ने पीछे से निहत्थे अभिमन्यु पर ज़ोरदार प्रहार किया। उस वार की मार अभिमन्यु सह ना सका और वीरगति को प्राप्त हो गया। अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार जब अर्जुन को मिला तो वह बेहद क्रोधित हो उठे और अपने पुत्र की मृत्यु के लिए शत्रुओं का सर्वनाश करने का फैसला किया।

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