सऊदी अरब ने योग को दिया ‘खेल’ का दर्जा- योग का अर्थ एवं परिभाषा

15 November 2017
——————————-

सऊदी अरब ने योग को

दिया ‘खेल’ का दर्जा

सऊदी अरब सरकार ने एक खेल गतिविधि के रूप में योग को मंजूरी दे दी है, सऊदी राज्य में अरब योग फाउंडेशन के संस्थापक नोफ मारवाई की एक सोशल मीडिया पोस्ट ने दावा किया,

सऊदी अरब के राज्य ने योग की प्रथा को मान्यता प्राप्त खेल के रूप में मान्यता दे दी है, जो वहां स्वतंत्र रूप से अभ्यास कर सकते हैं.

एक पंक्ति में समाचार-

सऊदी अरब सरकार-एक खेल गतिविधि के रूप में योग को मंजूरी दी.

IBPS PO मुख्य परीक्षा के लिए उपयोगी तथ्य-

21 जून – संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्दिष्ट- अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस-2015 में.सऊदी अरब की राजधानी – रियाद, मुद्रा- सऊदी रियाल.

 

योग का अर्थ एवं परिभाषा

Concept Of Yoga And Definition

योग तत्वतः बहुत सूक्ष्म विज्ञान पर आधारित एक आध्यात्मिक विषय है जो मन एवं शरीर के बीच सामंजस्य स्थापित करने पर ध्यान देता है। यह स्वस्थ जीवन-यापन की कला एवं विज्ञान है। योग से जुड़े ग्रंथों के अनुसार योग करने से व्यक्ति की चेतना ब्रह्मांड की चेतना से जुड़ जाती है जो मन एवं शरीर, मानव एवं प्रकृति के बीच परिपूर्ण सामंजस्य का द्योतक है। आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्मांड की हर चीज उसी परिमाण नभ की अभिव्यक्ति मात्र है। जो भी अस्तित्व की इस एकता को महसूस कर लेता है उसे योग में स्थित कहा जाता है और उसे योगी के रूप में पुकारा जाता है जिसने मुक्त अवस्था प्राप्त कर ली है जिसे मुक्ति, निर्वाण या मोक्ष कहा जाता है। इस प्रकार, योग का लक्ष्य आत्म-अनुभूति, सभी प्रकार के कष्टों से निजात पाना है जिससे मोक्ष की अवस्था या कैवल्य की अवस्था प्राप्त होती है। जीवन के हर क्षेत्र में आजादी के साथ जीवन-यापन करना, स्वास्थ्य एवं सामंजस्य योग करने के प्रमुख उद्देश्य होंगे। योग का अभिप्राय एक आंतरिक विज्ञान से भी है जिसमें कई तरह की विधियां शामिल होती हैं जिनके माध्यम से मानव इस एकता को साकार कर सकता है और अपनी नियति को अपने वश में कर सकता है। चूंकि योग को बड़े पैमाने पर सिंधु-सरस्वती घाटी सभ्यता, (जिसका इतिहास 2700 ईसा पूर्व से है), के अमर सांस्कृतिक परिणाम के रूप में बड़े पैमाने पर माना जाता है, इसलिए इसने साबित किया है कि यह मानवता के भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों तरह के उत्थान को संभव बनाता है। बुनियादी मानवीय मूल्य योग साधना की पहचान हैं।

    योग का अर्थ है जोड़ना। किससे? सत्य से! सत्य से जुडना आसान नहीं, क्योंकि वह अत्यंत सूक्ष्म है और दिव्य भी। ऋषियों ने कहा है कि जिसे प्राप्त करना चाहते हो, उस सरीखा अपना स्वभाव बनाओ। स्पष्ट संकेत है, सत्य कि अनुभूति करना चाहते हो, तो सत्य का आचरण करो। सत्य का आचरण करने का अर्थ है अपनी आदतों से टकराओ। उसके लिए मनोबल चाहिए। मन का संबंध शरीर से है इस प्रकार अपनी आदतों से संघर्ष रूपी तप के लिए जरूरी है तन-मन अर्थात् दोनों का बलवान होना। बाह्य साधनाओं को आवश्यकीय मानने का आधार यही तथ्य है। ऋषियों ने साधना की शूरूआत बेसिक बातों से की। वे जानते थे, कि छोटी-छोटी कही जाने वाली बातों का महत्व। वे जानते थे छोटा-छोटा ही निर्माण करता है बड़े का बूंद-बूंद से बनता है महासागर-जो अनंतशक्ति संपन्न होता है, जिसकी गहराई को नाप पाना असंभव हो जाता है।

    योग का अर्थ आत्मा का परमात्मा के मिलन से है, योग क्या है? इस प्रसंग के सामंजस्य के लिए हमें योग को दो भागों में विभाजित करके विचार करना पड़ेगा –

                                1. योग साधना

                                2. योग दर्शन

    जीवन जीने की साधना की दृष्टि में योग एक ऐसी जीवनी कला है, जिसके द्वारा साधक इस लोक में एहिक विषयों का सेवन करते हुये भी ‘जले कमलवत’ निर्लिप्त रह सकता है। आसक्ति को छोड़कर नियत कर्म करना ही योग है, और इसी का नाम कर्मयोग भी है।

    महर्षि पतंजली ने ‘पातंजल योग सूत्र’ में योग के उपर्युक्त दोनों पक्षों अर्थात् योग साधना और योग दर्शन का बड़ा हृदग्राही समन्वय किया है, इसलिए यह ग्रन्थ योग साधकों, योग दार्शनिकों के लिए सर्वाधिक प्रिय है।

    अन्य परिभाषा – योग शब्द ‘युज’ धातु से उत्पन्न हुआ है, धातु पाठ में योग शब्द के लिए दो धातु प्राप्त होती है – 1. युजिर योगे

                     2. युज समाधो

    “युजिर योगे” धातु से निष्पन्न योग शब्द सामान्य सम्बन्ध का वाचक है। इस शब्द की योग साधना के क्षेत्र में कोई उपयोगिता नहीं है।

    “युज समाधो” धातु से निष्पन्न योग शब्द का अर्थ- समाधि से है, “व्यास भास्य” में “योगः समाधि” कहकर योग का समाधि से प्रायः स्विकार किया है।

पाणिनि जी ने योग शब्द की व्युत्पत्ति युजिर योगे, युज समाधो इन दो धातुओं से की है। प्रथम उत्पत्ति के अनुसार योग शब्द का अनेक अर्थों में प्रयोग किया जाता है। जैसे – जोड़ना,मिलना, मेल इत्यादि।

    इसी आधार पर जिवात्मा और परमात्मा का मिलन योग कहलाता है। इसी संयोग कि अवस्था को समाधि की संज्ञा दी गई है, जो कि जिवात्मा परमात्मा की समता अवस्था जनित होती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *